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श्री हनुमान जन्मोत्सव पर विशेष…

#श्री हनुमान जन्मोत्सव पर विशेष-

#जयचिरहुलानाथ

 

शक्ति के दो ध्रुव, एक पालनहार (श्री हरि विष्णु) तो दूसरा संहारक (भगवान शिव) दोनों ही वैभव व विलासिता से कोसों दूर। अपार सामर्थ्य होने के बावजूद कोई गर्व नहीं सदैव संकट से तीनों लोकों को उबारने वाले।

एक सृष्टि में धर्म की स्थापना के लिए सज्जनों की रक्षा व दुष्टों का विनाश करने के लिए धरती पर रामावतार लेकर अवतरित होते हैं तो दूसरे रुद्रावतार हनुमान के रूप में उनकी सहायता के लिए उनके अनन्य सेवक बनकर भक्ति का पर्याय बन जाते हैं। दोनों एक दूसरे को अपना-अपना आराध्य मानते हैं।

 

एक “नमामि शमीशान निर्वाण रूपं” से अपने आराध्य को पूजते हैं तो दूसरे “जय राम रमा रमनं समनं” से अपने इष्ट का गुणगान करते हैं। दोनों ही एक दूसरे के स्वरूप को जानते है पर जब पहली बार मिलते हैं तब बाबा तुलसी दास जी किष्किंधाकांड में लिखते हैं….

 

“विप्र रूप धरि कपि तंह गयऊ।माथ नाइ पूँछत अस भयऊ।।

 

की तुम्ह श्यामल गौर शरीरा।छत्रिय रूप फिरहुं बनबीरा।।

 

कठिन भूमि कोमल पदगामी।कवन हेतु बन बिचरहुं स्वामी।।

 

की तुम्ह तीन देव मँह कोऊ। नर नारायण की तुम्ह दोऊ।।

 

जग कारन तारन भव, भंजन धरनी भार।

की तुम्ह अखिल भुवन पति, लीन्ह मनुज अवतार॥”

 

एक साथ में हनुमान जी ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी भगवान सम्मुख खड़े हैं और हनुमानजी पूछ रहे है कौन हो आप नर नारायण या अखिल भुवनपति यहां श्री हनुमंतलाल वेश बदलकर आये हैं लेकिन भगवान श्रीराम ने सारे प्रश्नों को काट दिया।

भगवान ने ” कोसलेस दशरथ के जाए” से लेकर ” नाम राम लछिमन दोउ भाई” व इहाँ हरी, निशिचर,वैदेही” तक का पूरा वृत्तांत सुनाते हैं भगवान कहना चाहते हैं हम निराकार नहीं हैं न ही ब्रह्म हैं हम तो पिता की आज्ञा से यहां आए हैं, और सीता को ढूंढ रहे हैं लेकिन भक्त को तो भगवान की पहचान होती है सो हनुमान ने प्रभु को पहचान लिया और भक्त वत्सल की शरण में चरणों में हो लिए । बाबा तुलसीदास लिखते हैं….

 

प्रभु पहिचान परेउ गहि चरना।सो सुख उमा जाइ नहिं बरना।।

 

तीनों लोकों के स्वामी अपने आप को “एक मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अज्ञान” कह रहे हैं। सूर्य जैसे तेज को मुंह में लेकर निस्तेज करने वाले पूरे ब्रह्मांड को अपनी बल,बुद्धि व विद्या से आलोकित करने वाले बजरंगबली भगवान श्री राम के आगे कितने विनीत कितने सरल व अज्ञानी बने हैं वो जितेंद्रिय हैं अहंकार का नाश करने वाले हैं,

 

प्रभु श्रीराम के मिलने के बाद से हर क्षण उनके साथ रहते हैं सुग्रीव से मैत्री कराते हैं व सुग्रीव के अपना मैत्रीधर्म भूलने पर फटकारते भी हैं।कुशल रणनीतिकार की तरह लंका पहुंचने से पहले उन्होंने पूरी रणनीति बनाई। असुरों की इतनी भीड़ में भी विभीषण जैसा सज्जन ढूंढा। उससे मित्रता की और सीता मां का पता लगाया।

विभीषण को प्रभु राम की महिमा बताई।मर्यादा स्थापित करने के लिए प्रभु के निर्देश में रावण जैसे अभिमानी का लंका दहन करके उसके दर्प का भंजन किया। प्रभु श्रीराम व माता सीता की कृपा से अमर होकर कलयुग में भी संतो व सज्जनों की रक्षा के लिए इस धरती पर हैं किसी न किसी रूप में वो हमें दर्शन देते रहते हैं बस उन्हें पहचानने वाली भक्ति की आंखे चाहिए।

 

कलयुग में जहां जरा सी शक्ति आने पर व्यक्ति बौखला जाता है बजरंगी विनाशक होने के बावजूद भी सज्जनों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर हैं। यहां तो एक मंडल अध्यक्ष भी सत्ता के मद में चूर होकर सरकार बनाने व बिगाड़ने का दम भरता रहता है और मौका पाने पर नुकसान करने से बाज नहीं आता।

 

हम सभी को श्री हनुमान जी से सटीक योजना,मूल्यों की रक्षा,दृढ़ आत्मविश्वास,नीतिकुशलता,अदम्य साहस,श्रेष्ठ नेतृत्व,हर परिस्थिति में खुश रहना व विनम्रता व आराध्य पर पूर्ण विश्वास जैसे असंख्य गुणों को आत्मसात करना चाहिए।

हनुमान जी ने लंका दहन किया शनि, भीम, अर्जुन,बलराम का घमंड प्रभु के आशीष से चूर चूर किया कई असुरों का वध किया अपनी श्रेष्ठता साबित की किंतु कभी विनम्रता और भक्ति नहीं छोड़ी।प्रभु पर अपना अटूट विश्वास नहीं छोड़ा।वह वानरयूथ थे जामवंत के मार्गदर्शन से उत्साह पूर्वक रामकाज किया।

 

भगवान चिरहुलानाथ के जन्मोत्सव पर आइए हम सब सब संकल्प लें कि हमेशा सच के साथ निडरता के साथ खड़े रहें कभी असत्य का साथ न दें व हरसंभव दूसरों की मदद को मानवता की रक्षा के लिए निःस्वार्थ भाव से सदैव तत्पर रहें।तभी रामराज्य स्थापित हो सकेगा।

 

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं।

दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम ।

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं

रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।।३।

 

जय चिरहुला नाथ,

जय खेमसागर महाराज।

 

शिव पूजन मिश्रा

चौकी प्रभारी उकवा

जिला बालाघाट (म.प्र.)

 

खबर संकलन प्रफुल्ल कुमार चित्रीव बालाघाट

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